Monday, October 21, 2019

मझधार में है जीवन...

हम पता नहीं क्यों जिंदगी की उलझनों में उलझ जाते हैं कि संभले नहीं संभल पाते। रिश्ते मानने और रिश्ते निभाने में कितना फर्क आ जाता है। जितने नजदीकी रिश्ते उनकी हैडलिंग उतनी ही ज्यादा पर फिर भी उनमें कुछ दरकने लगता है। ये रिश्ते क्यों एक दूसरे पर अपनी बातों का बोझ डालते हैं। कहते हैं जो बीत जाता है उसे भूल जाना चाहिए लेकिन उससे सबक भी लेना चाहिए। क्या पति का रिश्ता ऊपर होता है या मां बाप या भाई बहन ऐसे प्रश्नों में उलझ कर रह जाती है जिंदगी। सब अपने रिश्ते का अहसास जताकर अपनी मौजूदगी दर्शाते हैं पर कोई मन की बात समझने और जानने की कोशिश नहीं करता। सब कहते हैं तुझे नहीं पता। हर कोई अपने तर्क लेकर अपने अहसास को सहलाते हैं। क्या किसी को अहसास नहीं होता कि उनके होने से जीवन में क्या है और उनके हटने से जिंदगी में क्या हो सकता है। हर रिश्ते की अपनी खासियत है उसको रिश्ते के बोझ तले नहीं दबाना चाहिए और न ही उनको एक दायरे में बांधना चाहिए। जीवन एक दरिया है जिसमें कोई बांध नहीं बनाना चाहिए उसे अविरल बहने देना चाहिए। निश्चल, शांत और सहज। अपनी चाहतों को दूसरे के कंधें पर रखकर ऊपर चढ़ना नहीं चाहिए।
एक दूसरे के रिलेशन की कड़वाहट में तीसरे को निशाना बनाना कहां तक सही है। माना डोर उधर से ही होकर जाती है लेकिन उस डोर में कहीं गांठ न लग जाए।
मर्द कहता है मैं मर्द हूं मेरे काम पैसा कमाना है भले ही नौकरी हो या बिजनेस। लेकिन औरत न तो वह अबला रही न सबला वह मझधार में अटकी नाव हो गई है न इधर जा पाती है न उधर जा पाती है। बस एक ही जगह पर खड़े खड़े चक्कर लगाती रहती है।
पुरुष कहता है मैं  कहूंगा वही माना जाएगा के सिद्धातं पर अडिग वह नहीं जानता कि वह कौनसे युग में जी रहा है। औरत अपने अहमं को कम अपने दायित्वों के बोझ तले हर मैदान में कमर कस के उतर जाती है। धीरे धीरे उसका ढहना शुरू होता है। पति, बच्चे और रिश्ते मैं खुद को कही गुमा देती है। हर इच्छा और हर आरजू एक दायरे में ही सिमट कर रह जाती है।
वही उसने आवाज उठाई तो उसकी आवाज को यह कह कर दबाने में महिलाएं भी कम नहीं रहती कि तुम को बाहर की हवा लग गई है। अब भी हिन्दुस्तान में मर्दों के साए में ही जीना पड़ता है औरतों को। और तो और यह उनके लिए सही भी है इसका भी तालठोक कर दावा करती हैं साथ ही अपने साथ और आसपास के ऐसे ही अनेकों उदाहरण प्रस्तुत करती है जैसे अब तक आपकी जो सोच थी वह सपने में उड़ान भर रही थी।